Wednesday, December 13, 2017

क्या तुमने कभी देखा है ......अरशद अली ( एक कविता)





क्या तुमने कभी देखा है ......
नए ज़न्मे बच्चे को देखते हुए
माँ-बाप को
उसमे जो दिखता है ...
वो ख़ुशी है

और ख़ुशी,गम को दूर कर देती है












क्या तुमने कभी देखा है
घोड़ों को सपाट धरती पर
दौड़ते हुए
उसमे जो दिखता है ...
वो स्फूर्ति है

और स्फूर्ति,आलस को दूर कर देती है.








क्या तुमने कभी देखा है ...
बरसात में अन्कुराते हुए
नए बीजों को
उसमे जो दिखता है
वो ज़िन्दगी है

और ज़िन्दगी,मौत को करीब कर देती है.


====अरशद अली====

Wednesday, November 29, 2017

सीढियां उपर जाने के लिए होती हें ..........अरशद अली


उनका मर जाना, सहज एक घटना थी।
उम्र के इस पड़ाव पर उन्हें मरना हीं  था।

कुछ लोग उनके  की नहीं रहने पर
होने वाली समस्याओं को अन्यथा में लेंगे।

कुछ साथ देने का आडम्बर रचेंगे। 
कुछ कर्म कांड में ब्यस्त रहेंगे।

सीढ़ी से गिर गयी थी माँ, उसी सीढ़ी से.....
जिसे पिताजी ने उपर जाने के लिए बनवाया था।

सीढियां उपर जाने के लिए होती हें,
और निचे उतरने में भी मदद करती हें।

मगर कुछ सीढियाँ मात्र उपर ले जाती हें।
निचे आने की संभावनाओं को समाप्त करते हुए।

परिवार और सरकार के फाइल में माँ का घटाव हो चूका है,
पता तब चला जब पिताजी का पेंसन आधा हो गया।

मात्र पेंसन आधा नहीं हुआ , पेंसन आधा होते हीं
उनकी सुविधाएँ भी आधी हो गयी।

माँ का जाना सुखद रहा उनके लिए
जो बिछावन पर उनके जीवन को बोझ समझते थें।

परन्तु पिताजी जैसे आनाथ हो गए
4 बजे उठाना, काली  चाय,सब माँ के बदौलत था।

अन्यथा अन्य कहाँ समझ पातें हें उनकी आवश्यकता
अब वो भारी लगते हैं,और एक पहेली भी।

वो कभी माँ को भूल नहीं पाते
जबकि उनकी याददास्त बेहद कमजोर हो चुकी है।

उनका जूता पालीस करने वाला 50 रूपया लौटा गया मुझे
यह कहते हुए चाचा जी पैसा दे चुके थे पुनः दे गए।  

चाचा जी को अपने याददास्त पर गर्व है।
मैंने उनके गर्व को टूटने नहीं दिया, पैसा रख लिया।

आज माँ का नाम लेकर चिल्ला रहे थे।
बहुद दिनों से हवन नहीं करवा रही हो ..कब होगा ??

थोड़ी देर बाद एकदम मौन हो गए,
शायद शोक मना  रहे थे माँ के नहीं रहने का।

पिताजी ने हर दुःख सुख को माँ के साथ जिया है।
जाने कितनी बार माँ में उनके ज़ख्मों को सिया है।

सीढियां उपर जाने के लिए होती हें.......
सीढियां उपर जाने के लिए होती हें.......

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=====अरशद अली======

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Thursday, November 23, 2017

फासलों के लिए एक दीवार होना चाहिए।.......अरशद अली

बेवजह लड़ने का इल्म
भी मेरे यार होना चाहिए ।

सामने से आये कोई
तो वार होना चाहिये ।

टालना मैंने नही सीखा
किसी बात को

सवाल पर जवाब का
प्रहार होना चाहिए ।

बेशक अमन कीमती
 है किसी घर के लिए

फासलों के लिए
एक दीवार होना चाहिए।

जंग जितने का हुनर
एक हीं है "अली"

सर कटाने को
हमेशा तैयार होना चाहिए।

अरशद अली

Sunday, January 25, 2015

मेरे मन की एक तश्वीर ........Arshad Ali

………………………मेरे मन की एक तश्वीर 

………..................…………मन में पलता एक उम्मीद 

……………… … मगर उम्मीदों  को फांसी होना है 

………………उम्मीद मरेगा   …बस रोना है 


Sunday, September 7, 2014

अरशद अली ......अपने 38 वे पड़ाव पर

जन्म दिवस की शुभकामनाओं से दिन की शुरुआत हुई अपने पराये लगे पराये अपने लगे ......बात मतलब की यही रही की एक बसंत और गया ....ग़मज़दा रहूँ या जश्न मना लूँ यही सोंच रहा हूँ ......वक़्त तो मुट्ठी से फिसलता हुआ रेत है .....जाने कितना वक़्त हाथ से निकल गया और कितना बाकी है निकल जाने को ......इसी उधेड़बुन में मन से निकली इस कविता से  मेरे मनोभाव का सटीक चित्रण हो इस  लिए मैंने जीवन के सभी रंगों को एक केनवस पर डालने का प्रयास किया है...आप की टिप्पणी की आवश्यकता है...


उठते गिरते
चलते चलते
मंजिल मंजिल करते शोर
एक जन्म फिर जन्मदिवस
फिर हल्ला गुल्ला चारो ओर
एक कदम
फिर एक कदम
बढ़ते हुए कब्र की ओर

अच्छे बुरे हर काम में शामिल
जीवन के जंजाल में शामिल
किसी के शादी
किसी की मय्यत
अफरा तफरी चारो ओर
एक कदम
फिर एक कदम
बढ़ते हुए कब्र की ओर

पाप पुण्य की
नाप जोख में
कभी उत्सव में
कभी शोक में
निराशाओं के सभी रात में
आशाओं की आती भोर
एक कदम
फिर एक कदम
बढ़ते हुए कब्र की ओर .

अरशद अली ......अपने 38  वे  पड़ाव पर 

Wednesday, July 9, 2014

चलो दिया से बाती के रिश्तों की एक वज़ह ढूंढें ---------अरशद अली


गली मोहल्ले से एक  कहानी को गुज़रते देखा 
हर किरदार को किसी और में  ठहरते  देखा 

कोई मुझमे था एहसास हुआ मुझको भी 
मैंने उसे देख आईने को सवरते देखा 

एक शोर में दब जाया करतें थे  उसके लफ्ज़ बेवजह 
उन  आवाज़ को अपने अंदर हीं टहलते देखा 

चलो दिया से बाती के रिश्तों की एक वज़ह ढूंढें 
जब भी देखा बाती को दिया में हीं जलते देखा 

कागज़ में दर्ज़ गवाहों के पते पर 
मैंने मुज़रिम को कई बार ठहरते देखा 

---अरशद अली ---

Tuesday, July 1, 2014

एक ख़त जला और गुजरा हुआ वक़्त दिख गया ...........अरशद अली

कुछ लफ्ज़ मेरे लब को
नेकी-बदी ने दी
एक तमाचा मेरे गुरुर पर
मेरी ख़ुदी ने दी
एक अश्क मेरे शक्ल का
इस ज़िन्दगी ने दी
सब छूटने का ग़म
मेरी बेखुदी ने दी
एक ख़त जला और
गुजरा हुआ वक़्त दिख गया
एक अँधेरा मेरी ज़िन्दगी को
इस रौशनी ने दी
सब लफ्ज़ इन हवाओं में
महफूज़ अब भी है
मौत मेरी ज़िन्दगी को
इसी ज़ुस्तज़ु ने दी
अब पूछने को कई
सवाल ज़िंदा हैं
दिल टूट जाने की सजा
खामोशियों ने दी

---अरशद अली ---