Saturday, August 27, 2011

2nd हैण्ड जूता................अरशद अली

पुत्र ने पिता से पूछा,
पापा मुनाफा किसे कहते हैं?
पिता ने सरलता से कहा,
कोई बस्तु कम कीमत का हो
और अधिक मूल्य में बीक जाता है
तो जो अतिरिक्त धन प्राप्त होता है
वही मुनाफा है.

पुत्र ने कहा,
तब तो मुझे मुनाफा कमाना आ गया
असल में चौकीदार को आपका जूता भा गया
कल आप मम्मी पर जूते को लेकर
चिल्ला रहे थे
तुम्हारे बाप का दिया दहेजुआ जूता
एक कौड़ी का है बतला रहे थे...

मैंने उसी एक कौड़ी के जूते को
चौकीदार से 20 रूपया में बेच दिया हूँ
और एक कौड़ी के जूते पर
कई रूपया मुनाफा लिया हूँ

पिता ने कहा,
मुर्ख के बच्चे
वो जूता तो तुम्हारी माँ से
लड़ने का एक बहाना था..
उसे हीं बेच कर तुम्हे मुनाफा कमाना था?

जरुर तुम्हारी माँ ने ये सिखलाया होगा
तुम्हारे हाथ से उसी ने जूता बिकवाया होगा

पुत्र बोला,नहीं -नहीं
चौकीदार कुछ दिनों से नंगे पाँव
काम पर आ रहा था
कल देखा वो थोडा लंगड़ा रहा था
पूछने पर कहा ...
छोटे साहब जूता कहीं ग़ुम हो गया
2nd हैण्ड खरीदने के लिए भी पैसा कम हो गया
तभी मुझे आपके जूते बेचने का ख्याल आया
मेरे इस व्यवसाय को माँ ने नहीं सिखलाया

पिता ने कहा,
माँ के पक्षधर ,तुम्हारे इस व्यवसाय में
मुनाफा नहीं घाटा है
आज कल 2nd हैण्ड जूता भी 200 में आता है

सुनते हीं पुत्र ने पुनः एक प्रश्न दागा...
मुनाफा कैसे घाटा बन जाता है ?
और ये घाटा किसे कहा जाता है ?

पिता ने कहा,
इस प्रश्न का उत्तर ना हीं जानो तो अच्छा है
शादी से पहले तुम्हारी माँ मुनाफा,
शादी के बाद घाटा..
और इस घाटे का चक्रब्रिधि-ब्याज
तुम्हारे जैसा बच्चा है



9 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

जो नफे नुक्सान का ही हिसाब लगते हैं वो ज़िंदगी कहाँ जी पाते हैं ...अच्छी प्रस्तुति

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा दिनांक 29-08-2011 को सोमवासरीय चर्चा मंच पर भी होगी। सूचनार्थ

रविकर said...

बहुत बहुत बधाई ||

रेखा said...

बहुत ही रोचक और प्रेरक प्रसंग था ....आभार

Ojaswi Kaushal said...

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सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

बहुत खूबसूरत है अरशद भाई!!

रविकर said...

साढ़े छह सौ कर रहे, चर्चा का अनुसरण |
सुप्तावस्था में पड़े, कुछ पाठक-उपकरण |

कुछ पाठक-उपकरण, आइये चर्चा पढ़िए |
खाली पड़ा स्थान, टिप्पणी अपनी करिए |

रविकर सच्चे दोस्त, काम आते हैं गाढे |
आऊँ हर हफ्ते, पड़े दिन साती-साढ़े ||

http://charchamanch.blogspot.com/

आकाश सिंह said...

प्रिय अरशद अली जी नमस्कार
बहुत दिनों बाद आपकी एक नई प्रस्तुति पढने को मिली पढ़कर मन को शांति मिली शब्दों का मिलन और भावों की परिपूर्णता आपकी रचना की शानो-सौकत को उपर की श्रेणी में ले जाती है | मुझे आशा ही नही बल्कि पूर्ण विश्वास है की इसी तरह की भाव भरी रचना से हम सभी फिर से अवगत होंगे | मेरे ब्लोग्स पे आपका स्वागत है www.akashsingh307.blogspot.com

शाहजाहां खान “लुत्फ़ी कैमूरी” said...

achha hai...........