कुछ शब्दों के जोड़ घटाव से, घटनाओं के कई पड़ाव से, जो भी सिखा इस जीवन से, कुछ शब्द अरशद के मन से...................
Thursday, November 23, 2017
Sunday, January 25, 2015
Sunday, September 7, 2014
अरशद अली ......अपने 38 वे पड़ाव पर
जन्म दिवस की शुभकामनाओं से दिन की शुरुआत हुई अपने पराये लगे पराये अपने लगे ......बात मतलब की यही रही की एक बसंत और गया ....ग़मज़दा रहूँ या जश्न मना लूँ यही सोंच रहा हूँ ......वक़्त तो मुट्ठी से फिसलता हुआ रेत है .....जाने कितना वक़्त हाथ से निकल गया और कितना बाकी है निकल जाने को ......इसी उधेड़बुन में मन से निकली इस कविता से मेरे मनोभाव का सटीक चित्रण हो इस लिए मैंने जीवन के सभी रंगों को एक केनवस पर डालने का प्रयास किया है...आप की टिप्पणी की आवश्यकता है...
उठते गिरते
चलते चलते
मंजिल मंजिल करते शोर
एक जन्म फिर जन्मदिवस
फिर हल्ला गुल्ला चारो ओर
एक कदम
फिर एक कदम
बढ़ते हुए कब्र की ओर
अच्छे बुरे हर काम में शामिल
जीवन के जंजाल में शामिल
किसी के शादी
किसी की मय्यत
अफरा तफरी चारो ओर
एक कदम
फिर एक कदम
बढ़ते हुए कब्र की ओर
पाप पुण्य की
नाप जोख में
कभी उत्सव में
कभी शोक में
निराशाओं के सभी रात में
आशाओं की आती भोर
एक कदम
फिर एक कदम
बढ़ते हुए कब्र की ओर .
अरशद अली ......अपने 38 वे पड़ाव पर
उठते गिरते
चलते चलते
मंजिल मंजिल करते शोर
एक जन्म फिर जन्मदिवस
फिर हल्ला गुल्ला चारो ओर
एक कदम
फिर एक कदम
बढ़ते हुए कब्र की ओर
अच्छे बुरे हर काम में शामिल
जीवन के जंजाल में शामिल
किसी के शादी
किसी की मय्यत
अफरा तफरी चारो ओर
एक कदम
फिर एक कदम
बढ़ते हुए कब्र की ओर
पाप पुण्य की
नाप जोख में
कभी उत्सव में
कभी शोक में
निराशाओं के सभी रात में
आशाओं की आती भोर
एक कदम
फिर एक कदम
बढ़ते हुए कब्र की ओर .
अरशद अली ......अपने 38 वे पड़ाव पर
Wednesday, July 9, 2014
चलो दिया से बाती के रिश्तों की एक वज़ह ढूंढें ---------अरशद अली
गली मोहल्ले से एक कहानी को गुज़रते देखा
हर किरदार को किसी और में ठहरते देखा
कोई मुझमे था एहसास हुआ मुझको भी
मैंने उसे देख आईने को सवरते देखा
एक शोर में दब जाया करतें थे उसके लफ्ज़ बेवजह
उन आवाज़ को अपने अंदर हीं टहलते देखा
चलो दिया से बाती के रिश्तों की एक वज़ह ढूंढें
जब भी देखा बाती को दिया में हीं जलते देखा
कागज़ में दर्ज़ गवाहों के पते पर
मैंने मुज़रिम को कई बार ठहरते देखा
---अरशद अली ---
Tuesday, July 1, 2014
एक ख़त जला और गुजरा हुआ वक़्त दिख गया ...........अरशद अली
कुछ लफ्ज़ मेरे लब को
नेकी-बदी ने दी
एक तमाचा मेरे गुरुर पर
मेरी ख़ुदी ने दी
एक अश्क मेरे शक्ल का
इस ज़िन्दगी ने दी
सब छूटने का ग़म
मेरी बेखुदी ने दी
एक ख़त जला और
गुजरा हुआ वक़्त दिख गया
एक अँधेरा मेरी ज़िन्दगी को
इस रौशनी ने दी
सब लफ्ज़ इन हवाओं में
महफूज़ अब भी है
मौत मेरी ज़िन्दगी को
इसी ज़ुस्तज़ु ने दी
अब पूछने को कई
सवाल ज़िंदा हैं
दिल टूट जाने की सजा
खामोशियों ने दी
---अरशद अली ---
नेकी-बदी ने दी
एक तमाचा मेरे गुरुर पर
मेरी ख़ुदी ने दी
एक अश्क मेरे शक्ल का
इस ज़िन्दगी ने दी
सब छूटने का ग़म
मेरी बेखुदी ने दी
एक ख़त जला और
गुजरा हुआ वक़्त दिख गया
एक अँधेरा मेरी ज़िन्दगी को
इस रौशनी ने दी
सब लफ्ज़ इन हवाओं में
महफूज़ अब भी है
मौत मेरी ज़िन्दगी को
इसी ज़ुस्तज़ु ने दी
अब पूछने को कई
सवाल ज़िंदा हैं
दिल टूट जाने की सजा
खामोशियों ने दी
---अरशद अली ---
Tuesday, March 18, 2014
लापता नींद ढूँढ लेना इतना आसान नहीं..............अरशद अली
रात जगा तो जगी रही सभी भावनाएं, कई बार शोर में जगा तो कई बार ख़ामोशी ने नींद में खलल डाली। जागना अच्छा था, सो जाता तो क्या पाता ....?
आखिर नींद उचट क्यों जाती है? उम्र होने पर ऐसा होता तो चलो कोई बात भी हो मगर ये गुमान भी तो नहीं पाल सकता। इसी क्रम में टेलीविज़न पर उसे देख रहा था , रेगिस्तान में नए रास्तों को खोजते हुए , पहले भी देखा है उसे यूँ हीं पागलपन के हदों को छूते हुए… बड़ा कटु जीव है… साँप तक खाने से गुरेज़ नहीं उसे , जीने के कई हतकंडे अपनाता है… अंत तक नज़र गड़ाए देखता रहा। कभी-कभी ऐसा लगा अपनी ज़िन्दगी भी कुछ ऐसी हीं है और मुश्किल घड़ी में हत्कन्डों को अपनाना जीवन जीने कि एक शैली है। हमें भी अपना चाहिए। नींद नहीं आने के कारणों में एक कारण भटकाव को भी मानता हूँ और भटकाव से बचने के लिए स्पष्ट चिंतन आवश्यक है। चिंतन के लिए एकाग्र होना पड़ता है। संसाधनों के बीच एकाग्र होना थोडा कठिन लगता है अंदर झाकना भी तो नहीं आता ऐसा भी होता तो भटकाव से बचा जा सकता था। एक सच्चाई ये भी माननी पड़ेगी कि चैन की नींद उसे मिलती है जो सोने से पहले तक अपने शारीर और मन से थक चूका होता है… अब उसे चारपाई पर सुलाओ या ज़मीन पर। नींद नहीं आना एक संकेत है उलझन का और उस उलझन में दिल कहाँ लगता काम में , इंसानी कामों को बाटने का एक सरल तरीका किसी बाबा ने सालों पहले बतलाया था।
कुछ काम अपने लिए करना होता है कु छ काम दूसरों के लिए, ताल-मेल बैठाना इन दोनों प्रकार के कामों में बाबा जी ने बतलाया हीं नहीं। तब से हीं बाबा जी को ढूंढ रहा हूँ। अमुक बाबा जी हों या
लापता नींद ढूँढ लेना इतना आसान नहीं। कोई तरीका होता तो नींद कि गोली क्यों खाता।
अब समाधान ढूंढने के लिए सुबह का इंतज़ार करना था। और मुई नींद भी दवा के असर के साथ थी कच्ची-पक्की अज़ीब सी, आई-आई नहीं भी आयी और एक प्रश्न का जन्म हुआ , उत्तर सभी को चाहिए, आखिर ऐसा मेरे साथ हीं क्यों होता है?
बाथरूम के नल से टपकती पानी के बूंद के शोर को दोषी बनाने कि पूरी तैयारी हो चुकी है । अब एक आरोप लगाना है शायद ऐसे हीं मन को बहलाना है । पक्का मन बहलते हीं नींद आ जायेगी इसी इंतज़ार में जगा जगा सा मै ……।
अरशद अली
आखिर नींद उचट क्यों जाती है? उम्र होने पर ऐसा होता तो चलो कोई बात भी हो मगर ये गुमान भी तो नहीं पाल सकता। इसी क्रम में टेलीविज़न पर उसे देख रहा था , रेगिस्तान में नए रास्तों को खोजते हुए , पहले भी देखा है उसे यूँ हीं पागलपन के हदों को छूते हुए… बड़ा कटु जीव है… साँप तक खाने से गुरेज़ नहीं उसे , जीने के कई हतकंडे अपनाता है… अंत तक नज़र गड़ाए देखता रहा। कभी-कभी ऐसा लगा अपनी ज़िन्दगी भी कुछ ऐसी हीं है और मुश्किल घड़ी में हत्कन्डों को अपनाना जीवन जीने कि एक शैली है। हमें भी अपना चाहिए। नींद नहीं आने के कारणों में एक कारण भटकाव को भी मानता हूँ और भटकाव से बचने के लिए स्पष्ट चिंतन आवश्यक है। चिंतन के लिए एकाग्र होना पड़ता है। संसाधनों के बीच एकाग्र होना थोडा कठिन लगता है अंदर झाकना भी तो नहीं आता ऐसा भी होता तो भटकाव से बचा जा सकता था। एक सच्चाई ये भी माननी पड़ेगी कि चैन की नींद उसे मिलती है जो सोने से पहले तक अपने शारीर और मन से थक चूका होता है… अब उसे चारपाई पर सुलाओ या ज़मीन पर। नींद नहीं आना एक संकेत है उलझन का और उस उलझन में दिल कहाँ लगता काम में , इंसानी कामों को बाटने का एक सरल तरीका किसी बाबा ने सालों पहले बतलाया था।
कुछ काम अपने लिए करना होता है कु छ काम दूसरों के लिए, ताल-मेल बैठाना इन दोनों प्रकार के कामों में बाबा जी ने बतलाया हीं नहीं। तब से हीं बाबा जी को ढूंढ रहा हूँ। अमुक बाबा जी हों या
लापता नींद ढूँढ लेना इतना आसान नहीं। कोई तरीका होता तो नींद कि गोली क्यों खाता।
अब समाधान ढूंढने के लिए सुबह का इंतज़ार करना था। और मुई नींद भी दवा के असर के साथ थी कच्ची-पक्की अज़ीब सी, आई-आई नहीं भी आयी और एक प्रश्न का जन्म हुआ , उत्तर सभी को चाहिए, आखिर ऐसा मेरे साथ हीं क्यों होता है?
बाथरूम के नल से टपकती पानी के बूंद के शोर को दोषी बनाने कि पूरी तैयारी हो चुकी है । अब एक आरोप लगाना है शायद ऐसे हीं मन को बहलाना है । पक्का मन बहलते हीं नींद आ जायेगी इसी इंतज़ार में जगा जगा सा मै ……।
अरशद अली
Friday, March 14, 2014
गाड़ी सड़क पर दौड़ते हुए निकल जायेगी …………… अरशद अली
गाड़ी सड़क पर दौड़ते हुए निकल जायेगी
सड़क नेह लगा लेगा उस गाड़ी से
सड़क को नाज़ रहेगा अपने ऊपर से गुजरे गाड़ी पर
गाड़ी शर्मिंदा रहेगी सड़क पर
उसने कई सड़कों से गुज़ारा है खुद को
और तुलनात्मक अध्ययन में
सड़क कि कई खामियां दिख जायेगी
गाड़ी आगे निकलते हुए सड़क पर आरोप
जड़ देगी और सड़क आहात हो जायेगा
गाड़ी का क्या है उसे कई और मोड़ मिलेंगे
कई और मज़िल
और सड़क इंतज़ार करेगा गाड़ी का
तड़पेगा मचलेगा
उसके याद में खोया रहेगा
बीते समय को सहेजेगा
यादों से बात करेगा
और गाड़ी के इंतजार मे
हमेशा वहीँ पड़ा रहेगा …
गाड़ी सड़क पर दौड़ते हुए निकल जायेगी
सड़क नेह लगा लेगा उस गाड़ी से
सड़क को नाज़ रहेगा अपने ऊपर से गुजरे गाड़ी पर
गाड़ी शर्मिंदा रहेगी सड़क पर
उसने कई सड़कों से गुज़ारा है खुद को
और तुलनात्मक अध्ययन में
सड़क कि कई खामियां दिख जायेगी
गाड़ी आगे निकलते हुए सड़क पर आरोप
जड़ देगी और सड़क आहात हो जायेगा
गाड़ी का क्या है उसे कई और मोड़ मिलेंगे
कई और मज़िल
और सड़क इंतज़ार करेगा गाड़ी का
तड़पेगा मचलेगा
उसके याद में खोया रहेगा
बीते समय को सहेजेगा
यादों से बात करेगा
हमेशा वहीँ पड़ा रहेगा …
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