कई साल पहले
ग्रेनाईट के चट्टान पर चढ़ते हुए
महसूस किया थकान
सीधी खड़ी चढ़ाई
चाहिए था कुछ आराम ..
बैठा ख्यालों में टकटकी लगाये
उस हाईवे पर जो ग्रेनाईट के चट्टान
के नीचे नीचे गुजरता था और गुजरता था
कई बड़े ट्रकों को पत्थर ढ़ोते हुए ...
एक सनसनी छा गयी
मै सोंचता रहा ट्रक को बड़ा
मगर इश्वर की इस रचना जिसपर मै बैठा था
मनुष्य के रचना से बड़ा था
और ग्रेनाईट का चट्टान छोटा था मिस्र के पिरामिड से..
अब मै रहता हूँ पहाड़ के तराई में
और डूब सा जाता हूँ दुःख की गहराई में
सोंचता हूँ मेरी समस्याएं बहुत बड़ी हें
जब भी ऐसी सोंच जन्म लेती है..
मै दृष्टि टिका देता हूँ पहाड़ पर
मेरी समस्याएं छोटी होते चली जाती हें..
जब भी दिन रात में बदल जाता है
तब सितारों को निहारता हूँ और
सोंचने लगता हूँ कितना समय लगा होगा
असंख्य सितारों के निर्माण में
जाने कितनी दुनिया होंगी करोडो सितारों में
जाने कितने आकाश गंगाएं होंगी सितारों को समेटे हुए
और करोडो आकाश गंगाएं जो कल्पनाओं से परे हें
आकार में जाने कितने बड़े हें..
जो ट्रक से ग्रेनाईट के चट्टान से
पहाड़ से इस ग्रह से भी बड़े हें जिसपर मै रहता हूँ
मै सोंचता हूँ समस्याएं जो भी हें ..ईश्वर पर आस्था से,
आकाश गंगा से,पहाड़ से,ग्रेनाईट के चट्टान से
यहाँ तक की ट्रक से भी छोटी है,,
और मेरी समस्याएं उतनी बड़ी नहीं लगती जैसा मैंने
सोंचा था ..
(अंशतः एक अंग्रेजी आलेख से प्रभावित )
---अरशद अली---
कुछ शब्दों के जोड़ घटाव से, घटनाओं के कई पड़ाव से, जो भी सिखा इस जीवन से, कुछ शब्द अरशद के मन से...................
Sunday, March 21, 2010
Wednesday, March 10, 2010
विगत बर्षों में मैंने चौपाल को मरते देखा है..........अरशद अली
चौपाल बर्चस्व की लड़ाई का प्रतीत सदेव बना है
हर बार दो गुटों में समझौता करवाते पंचों में बैठे चौधरी जी सदेव बड़े न्यायी दिखे हैं
बन्दर वाला ग्याहे -ब्याहे दुग्दुगी बजा चौपाल पर भीड़ लगा हीं लेता है
चौपाल हर बार दुर्गापूजा में सज-धज कर चमक दमक में अपनी मटमैली पहचान खो हीं देता है
चौपाल गवाह बन हीं जाता है जब भी कुछ नया होता है
कई बार चौपाल न्याय को प्रकाष्ठा पर पहुचने का स्थान भी बना है
गावं में पकडे गए चोरो का कई बार यहाँ अपमान भी हुआ है
जाने यहाँ कितनी लड़कियों की ब्याह की बातें हुईं हैं ,जाने कितनों की बारातें टिकी हैं
और इसी चौपाल पर पुष्प भी तो चढ़ाया है हम सभी ने गावं के उस बीर शहीद के पार्थिव शारीर पर,जिसने कई गोलियां खाई थी रणभूमि में इस मात्रभूमी के लिए
इसी चौपाल पर नेताओं के लम्बे भाषणों को न समझते हुए भी हम ग्रामीणों ने सुना है
वोट खरीदने वालों ने कई बार ग्रामीणों को पैसा देकर मतलब के नेताओं को चुना है
कई बार होलिका दहन में दोनो समुदाय के ग्रामीणों ने भाईचारे के लिए प्रण किया है
पर चौपाल पर हीं कुछ असामाजिक तत्वों ने शांति-भाईचारे के प्रण को तोड़ दिया है
अब चौपाल अंजना सा लगता है
अब चौधरी जी की आवाज़ फसी सी लगती है सामुदायिक अशांति को शांत करवाने में
अब तो चौपाल पर विवाद और सैनिक जमावड़ा है
अब अपना चौपाल,चौपाल कहाँ है
अब तो मुन्नी बाई भी चौपाल पर नाचना नहीं चाहती जहाँ कुछ साल पहले तक पैसे बरसाए जाते थे मुन्नी बाई के कला पर
अब चौपाल,चौपाल कहाँ है जहाँ दीपावली में दोनों समुदाय द्वारा दिए जलाये जाते थे
अब तो चौपाल पर लोगों को डरते देखा है
विगत बर्षों में मैंने चौपाल को मरते देखा है......
---अरशद अली---
हर बार दो गुटों में समझौता करवाते पंचों में बैठे चौधरी जी सदेव बड़े न्यायी दिखे हैं
बन्दर वाला ग्याहे -ब्याहे दुग्दुगी बजा चौपाल पर भीड़ लगा हीं लेता है
चौपाल हर बार दुर्गापूजा में सज-धज कर चमक दमक में अपनी मटमैली पहचान खो हीं देता है
चौपाल गवाह बन हीं जाता है जब भी कुछ नया होता है
कई बार चौपाल न्याय को प्रकाष्ठा पर पहुचने का स्थान भी बना है
गावं में पकडे गए चोरो का कई बार यहाँ अपमान भी हुआ है
जाने यहाँ कितनी लड़कियों की ब्याह की बातें हुईं हैं ,जाने कितनों की बारातें टिकी हैं
और इसी चौपाल पर पुष्प भी तो चढ़ाया है हम सभी ने गावं के उस बीर शहीद के पार्थिव शारीर पर,जिसने कई गोलियां खाई थी रणभूमि में इस मात्रभूमी के लिए
इसी चौपाल पर नेताओं के लम्बे भाषणों को न समझते हुए भी हम ग्रामीणों ने सुना है
वोट खरीदने वालों ने कई बार ग्रामीणों को पैसा देकर मतलब के नेताओं को चुना है
कई बार होलिका दहन में दोनो समुदाय के ग्रामीणों ने भाईचारे के लिए प्रण किया है
पर चौपाल पर हीं कुछ असामाजिक तत्वों ने शांति-भाईचारे के प्रण को तोड़ दिया है
अब चौपाल अंजना सा लगता है
अब चौधरी जी की आवाज़ फसी सी लगती है सामुदायिक अशांति को शांत करवाने में
अब तो चौपाल पर विवाद और सैनिक जमावड़ा है
अब अपना चौपाल,चौपाल कहाँ है
अब तो मुन्नी बाई भी चौपाल पर नाचना नहीं चाहती जहाँ कुछ साल पहले तक पैसे बरसाए जाते थे मुन्नी बाई के कला पर
अब चौपाल,चौपाल कहाँ है जहाँ दीपावली में दोनों समुदाय द्वारा दिए जलाये जाते थे
अब तो चौपाल पर लोगों को डरते देखा है
विगत बर्षों में मैंने चौपाल को मरते देखा है......
---अरशद अली---
Friday, March 5, 2010
विवाद संस्कृति के नाम पर करने से मत चुको,ऐसा करो चाँद में भी दाग है,सर उठाओ और चाँद पर भी थूको ----अरशद अली
सबसे पहले गुरु जी को सादर प्रणाम कीजिये ....
वही गुरु जी जो, कमाल कर दिए हैं महिलाओं के छत्ते में हाँथ डाल कर ,अब लिखने में माहिर तो हैं हीं, हारेंगे थोड़े न,अगला पोस्ट लिखबे करेंगे ...नहीं तो लिख भी दिए होंगे थोडा ब्लोग्वानी पर जाकर पता लगवा लीजिये ....कुछ मिले तो मुझे भी जानकारी दीजियेगा.अब लिखेंगे तो चर्चा होगा ,चर्चा होगा तो बहस छिड़ेगा ...मामला खेल खेल में इतना गंभीर हो जाएगा की बस पूछिये मत..सारी महिलायें पुरषों को दोषी मानेंगी और हम गुरूजी के अनुयाई महिलाओं को संस्कृति,मर्यादा और पता नहीं क्या-क्या गुरुदेव ने हिंदी शब्दों का प्रयोग किया था, के द्वारा संस्कृति के पतन का कारण मान कर अपने बात पर अटक जायेंगे ..इतना हीं नहीं लिख दिया तो लिख दिया कह कर चमगादड़ की तरह उल्टा लटक जायेंगे..
मैंने तो ये सब गुरूजी से सिखा है..
हाँथ धो कर महिलाओं के पीछे पड जाओ
जो नहीं माने उससे तर्क की सीमा तक लड़ जाओ
विवाद संस्कृति के नाम पर करने से मत चुको
ऐसा करो चाँद में भी दाग है,सर उठाओ और चाँद पर भी थूको
मानो मत,दिमाग लड़ते रहो ...
सभ्य -असभ्य सभी को ब्लॉग पर मर्यादित शब्दों के प्रयोग का पाठ पढ़ते रहो
ऐसा करो सर कलम करने पर एक क्रन्तिकारी आलेख बनाओ
पोस्ट के नाम पर किनारे रह कर सभी को निशाना बनाओ
वेलेंटाइन दिवस पर लड़कियों को लड़कों से मिलने पर क्या अनर्थ होगा स्पस्ट
शब्दों में बतलाओ
फिर खोजना प्रारंभ करो की किसने किसने होली,दीपावली,छट,बसंत पंचमी पर
नहीं लिखा है
टिप्पणियां कर उन्हें कारण बताओ नोटिस दे डालो.
अब देखो लोकप्रियता कैसे बढती है.अगर फिर भी लोकप्रियता नहीं बढे तो
ब्लॉग छोड़ने का एक आडम्बर रचो..
कपडा जब तक फट ना जाए तब तक फिचो
फिर डिटर्जेंट पाउडर पर एक दोष लगाओ
कुछ दिन रूठे रहो पुनः राष्ट्रीय गीत गाते हुए वापस आ जाओ
अब पुनः लोकप्रियता नोट करो..बढ़ी नहीं मिले तो कहना..
ये सब कुछ तरीकें हैं खुद को ब्लॉग पर हिट करने के जो मैंने गुरूजी से सिखा है,आप भी सिख लीजिये ..समझ में आ गया हो तो पालन कीजिये अन्यथा विवाद करना भी मैंने गुरूजी से सिखा है ..आप बेवाकी से अपनी प्रतिक्रिया दें मै अपने कहे पर अड़ कर अंत तक नहीं हारूँगा ...और अगर हार गया तो गुरूजी का चेला नहीं.
---अरशद अली--
वही गुरु जी जो, कमाल कर दिए हैं महिलाओं के छत्ते में हाँथ डाल कर ,अब लिखने में माहिर तो हैं हीं, हारेंगे थोड़े न,अगला पोस्ट लिखबे करेंगे ...नहीं तो लिख भी दिए होंगे थोडा ब्लोग्वानी पर जाकर पता लगवा लीजिये ....कुछ मिले तो मुझे भी जानकारी दीजियेगा.अब लिखेंगे तो चर्चा होगा ,चर्चा होगा तो बहस छिड़ेगा ...मामला खेल खेल में इतना गंभीर हो जाएगा की बस पूछिये मत..सारी महिलायें पुरषों को दोषी मानेंगी और हम गुरूजी के अनुयाई महिलाओं को संस्कृति,मर्यादा और पता नहीं क्या-क्या गुरुदेव ने हिंदी शब्दों का प्रयोग किया था, के द्वारा संस्कृति के पतन का कारण मान कर अपने बात पर अटक जायेंगे ..इतना हीं नहीं लिख दिया तो लिख दिया कह कर चमगादड़ की तरह उल्टा लटक जायेंगे..
मैंने तो ये सब गुरूजी से सिखा है..
हाँथ धो कर महिलाओं के पीछे पड जाओ
जो नहीं माने उससे तर्क की सीमा तक लड़ जाओ
विवाद संस्कृति के नाम पर करने से मत चुको
ऐसा करो चाँद में भी दाग है,सर उठाओ और चाँद पर भी थूको
मानो मत,दिमाग लड़ते रहो ...
सभ्य -असभ्य सभी को ब्लॉग पर मर्यादित शब्दों के प्रयोग का पाठ पढ़ते रहो
ऐसा करो सर कलम करने पर एक क्रन्तिकारी आलेख बनाओ
पोस्ट के नाम पर किनारे रह कर सभी को निशाना बनाओ
वेलेंटाइन दिवस पर लड़कियों को लड़कों से मिलने पर क्या अनर्थ होगा स्पस्ट
शब्दों में बतलाओ
फिर खोजना प्रारंभ करो की किसने किसने होली,दीपावली,छट,बसंत पंचमी पर
नहीं लिखा है
टिप्पणियां कर उन्हें कारण बताओ नोटिस दे डालो.
अब देखो लोकप्रियता कैसे बढती है.अगर फिर भी लोकप्रियता नहीं बढे तो
ब्लॉग छोड़ने का एक आडम्बर रचो..
कपडा जब तक फट ना जाए तब तक फिचो
फिर डिटर्जेंट पाउडर पर एक दोष लगाओ
कुछ दिन रूठे रहो पुनः राष्ट्रीय गीत गाते हुए वापस आ जाओ
अब पुनः लोकप्रियता नोट करो..बढ़ी नहीं मिले तो कहना..
ये सब कुछ तरीकें हैं खुद को ब्लॉग पर हिट करने के जो मैंने गुरूजी से सिखा है,आप भी सिख लीजिये ..समझ में आ गया हो तो पालन कीजिये अन्यथा विवाद करना भी मैंने गुरूजी से सिखा है ..आप बेवाकी से अपनी प्रतिक्रिया दें मै अपने कहे पर अड़ कर अंत तक नहीं हारूँगा ...और अगर हार गया तो गुरूजी का चेला नहीं.
---अरशद अली--
Thursday, March 4, 2010
मै तुम्हे क्या लिखूं,तुम्हारे बिषय में जानता भी तो नहीं.
रिक्तता में खोजता हूँ...शुन्य तक निहारता हूँ
कल्पनाओं के रूपों में आकार धुन्धता हूँ..
बहुत सोंच कर भे कहा सोंच पता हूँ
शुन्य से चल कर शुन्य तक पहुँचता हूँ
मै तुम्हे क्या लिखूं,तुम्हारे बिषय में जानता भी तो नहीं.
निशब्द परिभाषाओं का अर्थ लगता हूँ
खुद को स्वार्थ के धरातल पर पता हूँ
सोंचता हूँ श्रींगार करोगी तुम मेरे लिए?
फिर मौन मौन और मौन में उत्तर कहाँ पता हूँ
मै तुम्हे क्या लिखूं,तुम्हारे बिषय में जानता भी तो नहीं.
अस्त ब्यस्त प्रतीक्षा में रहता हूँ
काल्पनिक चूड़ी की खनक रह रह कर सुनता हूँ
संभवतः कर्ण प्रिये मधुर स्वर सहद घोल दे जीवन में
कल्पनाओं का एक जाल बुनता रहता हूँ
मै तुम्हे क्या लिखूं,तुम्हारे बिषय में जानता भी तो नहीं.
जनता हूँ तुम्हारे पक्ष के लोग कई प्रश्न उठाएंगे
तुम्हारे शुभचिंतक मेरे अन्दर तुम्हारा प्रतिरूप तलाशने
में निशब्द कसौटी पर खरा उतरने के लिए छदम रूप धारूंगा
पर बास्तव में मै कोई छल नहीं करूँगा
मै तुम्हे क्या लिखूं,तुम्हारे बिषय में जानता भी तो नहीं.
मै बांटना चाहता हूँ तुमसे
अपने अंतर मन के दुखों को
ठण्ड की ठिठुरन,सूरज के किरणों की छुवन को
जीवन के प्रतेक पड़ाव के छण को
मै तुम्हे क्या लिखूं,तुम्हारे बिषय में जानता भी तो नहीं.
यही सोंचता हूँ काल के का आवरण ओढे कहीं दूर तुम
अपने शादी के जोड़े में गोटा टाकते होगे,
बिंदी चुदियाँ खरीदते होगे
स्वपन देखते देखते प्रफुलित हो जाया करते होगे
और कभी कभी ऐसा भी लगता है की
तुम दूर तक एक कल्पना हो ..और
मेरी कल्पनाएँ यु हीं पंख लगा कर उडती रहती है
मै तुम्हे क्या लिखूं,तुम्हारे बिषय में जानता भी तो नहीं.
--अरशद अली--
कल्पनाओं के रूपों में आकार धुन्धता हूँ..
बहुत सोंच कर भे कहा सोंच पता हूँ
शुन्य से चल कर शुन्य तक पहुँचता हूँ
मै तुम्हे क्या लिखूं,तुम्हारे बिषय में जानता भी तो नहीं.
निशब्द परिभाषाओं का अर्थ लगता हूँ
खुद को स्वार्थ के धरातल पर पता हूँ
सोंचता हूँ श्रींगार करोगी तुम मेरे लिए?
फिर मौन मौन और मौन में उत्तर कहाँ पता हूँ
मै तुम्हे क्या लिखूं,तुम्हारे बिषय में जानता भी तो नहीं.
अस्त ब्यस्त प्रतीक्षा में रहता हूँ
काल्पनिक चूड़ी की खनक रह रह कर सुनता हूँ
संभवतः कर्ण प्रिये मधुर स्वर सहद घोल दे जीवन में
कल्पनाओं का एक जाल बुनता रहता हूँ
मै तुम्हे क्या लिखूं,तुम्हारे बिषय में जानता भी तो नहीं.
जनता हूँ तुम्हारे पक्ष के लोग कई प्रश्न उठाएंगे
तुम्हारे शुभचिंतक मेरे अन्दर तुम्हारा प्रतिरूप तलाशने
में निशब्द कसौटी पर खरा उतरने के लिए छदम रूप धारूंगा
पर बास्तव में मै कोई छल नहीं करूँगा
मै तुम्हे क्या लिखूं,तुम्हारे बिषय में जानता भी तो नहीं.
मै बांटना चाहता हूँ तुमसे
अपने अंतर मन के दुखों को
ठण्ड की ठिठुरन,सूरज के किरणों की छुवन को
जीवन के प्रतेक पड़ाव के छण को
मै तुम्हे क्या लिखूं,तुम्हारे बिषय में जानता भी तो नहीं.
यही सोंचता हूँ काल के का आवरण ओढे कहीं दूर तुम
अपने शादी के जोड़े में गोटा टाकते होगे,
बिंदी चुदियाँ खरीदते होगे
स्वपन देखते देखते प्रफुलित हो जाया करते होगे
और कभी कभी ऐसा भी लगता है की
तुम दूर तक एक कल्पना हो ..और
मेरी कल्पनाएँ यु हीं पंख लगा कर उडती रहती है
मै तुम्हे क्या लिखूं,तुम्हारे बिषय में जानता भी तो नहीं.
--अरशद अली--
Wednesday, February 24, 2010
आपका नाता आपके प्रतिद्वंदी से क्या है? थोडा सोंचिये.
संबंधों की इस दुनिया में
रिश्ते नाते जाने कितने
हर नातों के कितने नातें
नातों के भी कितने गांठें
उन सब में एक और है नाता
ता उम्र जो संघ चलता है
प्रतिद्वंदी बन वो जो कहता है
कर्मों का है प्रतिध्वनि होता है
लाख नकारे मन फिर भी
प्रतिद्वंदी सदेव संघ रहता है ........
------प्रतिद्वंदी------
मै उसे समझता रहा
और वो मुझे
मै उसपर हँसता रहा
और वो मुझपर
मै उसमे खामियां धुन्धता रहा
और वो मुझमे
मै उसके मार्ग का अवरोध रहा
और वो मेरे
मै उसके सफलता को रोकने में जुडा रहा
और वो मेरे
मै उसके मार्ग भूलने पर उत्सव मनाया
और उसने मेरे
बुरे रूप में हीं वो मेरे मन मष्तिस्क पर छाया रहा
और शायद मै उसके
इसी आपाधापी में
मुझे उसकी असफलता से प्रेम हो गया
और मेरी असफलता से उसे
अब तो आदत हो गयी है उसे देखने की
और उसे भी यही लत है
अब जीवन के इस पड़ाव पर
मुझे उसके मृत्यू का इंतज़ार है
और उसे मेरे..
-----अरशद अली----
रिश्ते नाते जाने कितने
हर नातों के कितने नातें
नातों के भी कितने गांठें
उन सब में एक और है नाता
ता उम्र जो संघ चलता है
प्रतिद्वंदी बन वो जो कहता है
कर्मों का है प्रतिध्वनि होता है
लाख नकारे मन फिर भी
प्रतिद्वंदी सदेव संघ रहता है ........
------प्रतिद्वंदी------
मै उसे समझता रहा
और वो मुझे
मै उसपर हँसता रहा
और वो मुझपर
मै उसमे खामियां धुन्धता रहा
और वो मुझमे
मै उसके मार्ग का अवरोध रहा
और वो मेरे
मै उसके सफलता को रोकने में जुडा रहा
और वो मेरे
मै उसके मार्ग भूलने पर उत्सव मनाया
और उसने मेरे
बुरे रूप में हीं वो मेरे मन मष्तिस्क पर छाया रहा
और शायद मै उसके
इसी आपाधापी में
मुझे उसकी असफलता से प्रेम हो गया
और मेरी असफलता से उसे
अब तो आदत हो गयी है उसे देखने की
और उसे भी यही लत है
अब जीवन के इस पड़ाव पर
मुझे उसके मृत्यू का इंतज़ार है
और उसे मेरे..
-----अरशद अली----
Saturday, February 20, 2010
चाय के साथ सिगरेट पीने वालों के लिए सन्देश
अब जरा मिजाज़ हल्का किया जाए ..
बहुत हुआ मरने मारने की बात शायद आपको इल्म हो एक नया बलोग " उम्मीद " जो राजवंत दीदी ने शुरू किया है ने मेरे पिछले पोस्ट पर एक टिपण्णी दिया था की भाई ज़िन्दगी की बात करो ...तो चलिए ज़िन्दगी की बात करते है .
सिगरेट पीना स्वस्थ के लिए हानिकारक है ये बात किसे नहीं पता ...मगर मानता कौन है .आप ऐसा बिलकुल मत समझियेगा की मै कोई नसीहत देने वाला हूँ ..सिगरेट के डब्बे पर कोई कुछ भी लिख दे या बिच्छु बना दे तो लोग थोड़े मानने वाले हें.मै भी नहीं मानता आप भी मत मानो.
बस इसी मन्त्र के साथ दोस्तों ने आज चाय के साथ सिगरेट पिने की इच्छा जताई .ऑफिस के कामों को लटका कर हम तीनो निकल पड़े चाय की दुकान के तरफ .इतफाक कह लीजिये या हमारी किस्मत ,चाय की दुकान जहाँ भीड़ रहा करती थी बिलकुल खाली था..ख़ाली दुकान में मनचाहे स्थान पर बैठ कर चाय पिने का आनंद अलग है और यदि साथ साथ सिगरेट पीना हो तो खतरा भी कम..नहीं तो जाने कौन सा दुश्मन आपके घर ये खबर पहुंचा दे की आपके साहबजादे सिगरेट पिने लगें हें.चाय का आर्डर दिया चाय हाज़िर ..अब सिगरेट मंगवाना था आसन यही था की चाय वाले को हीं कहा जाए की सिगरेट ला दे .एक दस का नोट दिया दो सिगरेट मंगवाया ..यहाँ तक सब ठीक ठाक था मगर सुदामा (वही चाय वाला) जाने क्या बडबडाते हुए हमलोंगों के पास आया सिगरेट टेबल पर रखा और तीन रूपया वापस कर अपने चूल्हे के तरफ बढ़ गया ...उसकी बडबडाते रहने की पुरानी आदत है मुझे ये मालुम है..मैंने बड़े प्यार से पूछा .क्या बात है कुछ कहना चाहते हो तो कह दो ..मन हीं मन क्यों कुढ़ रहे हो..
नहीं साहब बात ऐसा कुछ नहीं है की चिंता की जाए मगर आप पूछ रहे है तो बतलाये देते हें..
साहब जी आज दस से ज्यादा बर्ष हो गए यहाँ चाय बेचते हुए मुझे यही लगता था की मेरी तीन रूपए की चाय हीं सबसे महंगी चीज है ..मगर साहब सिगरेट तो साढ़े तीन रुपये का एक मिलने लगा है ..हम तो दूध.चीनी,चायपत्ती,पानी मिला कर तीन रूपया में एक कप चाय देते है मगर ई सिगरेट की भी किस्मत देखिये ससुरा तम्बाकू है कागज़ में लपेट कर साढ़े तीन में बिकने लगा है ...और साहब आप लोग भी बड़े शोख से पीते हें चाय को भी और इस सिगरेट को भी कभी कभी शिकायत भी लगा देते हें की आज चाय अच्छा नहीं बना है मगर सिगरेट तो साफ साफ ज़हर है पर उसकी कहीं शिकायत भी नहीं होती ..यही सब सोंच रहा था साहब ..चलिए जाने दीजिये ...हमरा तीन रुपैया का चाय का क्या औकात जो सिगरेट से कुश्ती करे.ऐसे भी चाय ,सिगरेट ये सब चीजें नवाबों की पहचान है नहीं तो गरीबों को दो जून रोटी मिल जाए वही बहुत बड़ी बात है चाय,सिगरेट कौन पूछता है ..सुदामा बस बोलते चला जा रहा था और हम सुनते इसी बिच कभी टेबल पोछता कभी गिलास धोने लगता ..मगर उसके मन के उथल पुथल साफ़ थी..मै अच्छी तरह जानता था की सुदामा जो कहना चाहता है वो कह नहीं रहा है और जो कह रहा है उससे वो संतुस्ट नहीं ...मैंने इतना हीं कहा सुदामा तुम कहना क्या चाहते हो?
नहीं साहब मै क्या कहूँगा बस यू हीं अपने उपर हंसी आ रही है मै सोंचता था की मै चालक हूँ ,दूध में पानी मिला मिला कर चाय बेच कर मकान बना लूँगा मगर कहाँ बना पाया पर साहब ई सिगरेट की जितनी भी कंपनी है न वो तो सुदामा से भी चालक निकली सबकी चाँदी है ...मगर एक बात तो है साहब मै किसी के साथ खिलवाड़ तो नहीं करता चाय हीं पिलाता हूँ न पर ई सिगरेट तो जीवन बर्बाद कर रही है.मै आपको सिगरेट पीने से मना नहीं करूँगा मगर इतना तो ज़रूर कहूँगा की सिगरेट जब भी पीजिएगा तो मेरे यहाँ एक कप चाय जरुर पीजिएगा काहे की मेरा घर इसी से चलता है.
अंत तक सुदामा यूं हीं बडबडाता रहा मगर हम दोस्तों को ना कहते हुए भी एक बात बतला गया ....
आप भी समझ गए होंगे सुदामा क्या कहना चाहता था.
ये हुई ज़िन्दगी की बात ....क्यों हुई ना
--अरशद अली--
बहुत हुआ मरने मारने की बात शायद आपको इल्म हो एक नया बलोग " उम्मीद " जो राजवंत दीदी ने शुरू किया है ने मेरे पिछले पोस्ट पर एक टिपण्णी दिया था की भाई ज़िन्दगी की बात करो ...तो चलिए ज़िन्दगी की बात करते है .
सिगरेट पीना स्वस्थ के लिए हानिकारक है ये बात किसे नहीं पता ...मगर मानता कौन है .आप ऐसा बिलकुल मत समझियेगा की मै कोई नसीहत देने वाला हूँ ..सिगरेट के डब्बे पर कोई कुछ भी लिख दे या बिच्छु बना दे तो लोग थोड़े मानने वाले हें.मै भी नहीं मानता आप भी मत मानो.
बस इसी मन्त्र के साथ दोस्तों ने आज चाय के साथ सिगरेट पिने की इच्छा जताई .ऑफिस के कामों को लटका कर हम तीनो निकल पड़े चाय की दुकान के तरफ .इतफाक कह लीजिये या हमारी किस्मत ,चाय की दुकान जहाँ भीड़ रहा करती थी बिलकुल खाली था..ख़ाली दुकान में मनचाहे स्थान पर बैठ कर चाय पिने का आनंद अलग है और यदि साथ साथ सिगरेट पीना हो तो खतरा भी कम..नहीं तो जाने कौन सा दुश्मन आपके घर ये खबर पहुंचा दे की आपके साहबजादे सिगरेट पिने लगें हें.चाय का आर्डर दिया चाय हाज़िर ..अब सिगरेट मंगवाना था आसन यही था की चाय वाले को हीं कहा जाए की सिगरेट ला दे .एक दस का नोट दिया दो सिगरेट मंगवाया ..यहाँ तक सब ठीक ठाक था मगर सुदामा (वही चाय वाला) जाने क्या बडबडाते हुए हमलोंगों के पास आया सिगरेट टेबल पर रखा और तीन रूपया वापस कर अपने चूल्हे के तरफ बढ़ गया ...उसकी बडबडाते रहने की पुरानी आदत है मुझे ये मालुम है..मैंने बड़े प्यार से पूछा .क्या बात है कुछ कहना चाहते हो तो कह दो ..मन हीं मन क्यों कुढ़ रहे हो..
नहीं साहब बात ऐसा कुछ नहीं है की चिंता की जाए मगर आप पूछ रहे है तो बतलाये देते हें..
साहब जी आज दस से ज्यादा बर्ष हो गए यहाँ चाय बेचते हुए मुझे यही लगता था की मेरी तीन रूपए की चाय हीं सबसे महंगी चीज है ..मगर साहब सिगरेट तो साढ़े तीन रुपये का एक मिलने लगा है ..हम तो दूध.चीनी,चायपत्ती,पानी मिला कर तीन रूपया में एक कप चाय देते है मगर ई सिगरेट की भी किस्मत देखिये ससुरा तम्बाकू है कागज़ में लपेट कर साढ़े तीन में बिकने लगा है ...और साहब आप लोग भी बड़े शोख से पीते हें चाय को भी और इस सिगरेट को भी कभी कभी शिकायत भी लगा देते हें की आज चाय अच्छा नहीं बना है मगर सिगरेट तो साफ साफ ज़हर है पर उसकी कहीं शिकायत भी नहीं होती ..यही सब सोंच रहा था साहब ..चलिए जाने दीजिये ...हमरा तीन रुपैया का चाय का क्या औकात जो सिगरेट से कुश्ती करे.ऐसे भी चाय ,सिगरेट ये सब चीजें नवाबों की पहचान है नहीं तो गरीबों को दो जून रोटी मिल जाए वही बहुत बड़ी बात है चाय,सिगरेट कौन पूछता है ..सुदामा बस बोलते चला जा रहा था और हम सुनते इसी बिच कभी टेबल पोछता कभी गिलास धोने लगता ..मगर उसके मन के उथल पुथल साफ़ थी..मै अच्छी तरह जानता था की सुदामा जो कहना चाहता है वो कह नहीं रहा है और जो कह रहा है उससे वो संतुस्ट नहीं ...मैंने इतना हीं कहा सुदामा तुम कहना क्या चाहते हो?
नहीं साहब मै क्या कहूँगा बस यू हीं अपने उपर हंसी आ रही है मै सोंचता था की मै चालक हूँ ,दूध में पानी मिला मिला कर चाय बेच कर मकान बना लूँगा मगर कहाँ बना पाया पर साहब ई सिगरेट की जितनी भी कंपनी है न वो तो सुदामा से भी चालक निकली सबकी चाँदी है ...मगर एक बात तो है साहब मै किसी के साथ खिलवाड़ तो नहीं करता चाय हीं पिलाता हूँ न पर ई सिगरेट तो जीवन बर्बाद कर रही है.मै आपको सिगरेट पीने से मना नहीं करूँगा मगर इतना तो ज़रूर कहूँगा की सिगरेट जब भी पीजिएगा तो मेरे यहाँ एक कप चाय जरुर पीजिएगा काहे की मेरा घर इसी से चलता है.
अंत तक सुदामा यूं हीं बडबडाता रहा मगर हम दोस्तों को ना कहते हुए भी एक बात बतला गया ....
आप भी समझ गए होंगे सुदामा क्या कहना चाहता था.
ये हुई ज़िन्दगी की बात ....क्यों हुई ना
--अरशद अली--
Friday, February 19, 2010
एक सत्य (कविता)
उम्र के हिसाब से ये कविता मुझे नहीं लिखनी चाहिए थी मगर मुझे नहीं पता मैंने ऐसा क्यों सोंचा और कैसे कैसे ये कविता कागज पर उतर आये...
एक सत्य
मृत्यू सत्य है,डर जाओगे
तुम भी एक दिन मर जाओगे
बचपन के डर को मरते देखा
फिर बचपन को मरते देखा
युवा में सब नया नया सा
कुछ बर्षों तक साथ रहा था
इच्छाओं को मरता पाकर
अपनी जवानी मरते देखा
फिर प्रोढ़ हुआ जिमेदारी आई
हर शौख को मारा फ़र्ज़ निभाई
हर फ़र्ज़ को पूरा होते पाकर
हर सफ़र यूं हीं ठहरते देखा
फिर खुद को खुद से डरते देखा
इस सत्य से तुम भी डर जाओगे
तुम भी एक दिन मर जाओगे .
--अरशद अली--
एक सत्य
मृत्यू सत्य है,डर जाओगे
तुम भी एक दिन मर जाओगे
बचपन के डर को मरते देखा
फिर बचपन को मरते देखा
युवा में सब नया नया सा
कुछ बर्षों तक साथ रहा था
इच्छाओं को मरता पाकर
अपनी जवानी मरते देखा
फिर प्रोढ़ हुआ जिमेदारी आई
हर शौख को मारा फ़र्ज़ निभाई
हर फ़र्ज़ को पूरा होते पाकर
हर सफ़र यूं हीं ठहरते देखा
फिर खुद को खुद से डरते देखा
इस सत्य से तुम भी डर जाओगे
तुम भी एक दिन मर जाओगे .
--अरशद अली--
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