Saturday, January 9, 2010

कैसा लगेगा यदि आपका जन्मदिन हो और किसी अपने के मरने का समाचार आ जाये??

आप भी सोंच रहे होंगे की मै पगला गया हूँ
मगर जनाब अगर ऐसा हो जाए तो क्या होगा? जरा सोंचिये बिचारिये,ये अलग बात है आज तक आपने ऐसी कल्पना नहीं की है.
परन्तु ये असंभव तो नहीं.भगवान करे आपके साथ ऐसा कभी ना हो मगर भगवान की लीला अपरम्पार है इससे तो किसी को इनकार नहीं.चलिए मै सीधे मुद्दे पर आ जाता हूँ.
एक तरफ मन में ये उत्साह हो की सफलता पूर्वक मैंने अपना एक और बसंत पार किया.लोगो के बीच आज बधाई का पात्र हूँ जन्म दिवस की गहमा गहमी गिफ्टों का मिलना केक मिठाई दोस्त यार यानी मस्ती हीं मस्ती अचानक मोबाईल पर आये किसी कॉल में आपके जन्मदिन की बधाई न होकर ये समाचार हो की नाना जी /दादा जी/फूफा जी /काका जी अथवा कोई भी ऐसा इन्सान जो आपके बहुत करीब हो गुज़र गया तो आपको शायद ऐसा लग सकता है की यमदूत को अभी हीं ऐसा करना था.मगर आप कुछ भी सोंचे जो होना था हो गया अब आपके मन में कैसे कैसे बिचार आयेंगे ये आपके और उस व्यक्ति के सम्बन्ध पर आधारित होगा.या तो आप बहुत कम बिचलित होकर आये परस्थिति से लड़ने को तैयार हो जायेंगे अथवा जन्म एवं मृत्यू के आँख मिचोली में बिचलित होकर जन्मदिवस का उत्सव या मृत्यू का शोक दोनों में से कोई नहीं मना पायेगे.
ऐसी घटनाएँ अपने मानसिक स्थिति को थोडा बिचलित कर जाय तो कुछ नया नहीं है.जबकि ये अटल सत्य है की जन्म जीवन का आरम्भ है तो मृत्यू जीवन का अंत होता है और कोई इसे टाळ नहीं सकता मैंने आज ये प्रश्न इस लिए उठाया की मुझे इस अनुभव से गुजरने का एक मौका मिला है.
ऐसी परिस्थिति मन में भूचाल ला देती है और मन से कुछ पंक्तियाँ मन को बहलाने पता नहीं किस अंतर मन से आ जाते हें.

ऐसी हीं उहापोह में जन्मी कुछ पंक्तियाँ

उठते गिरते
चलते चलते
मंजिल मंजिल करते शोर
एक जन्म फिर जन्मदिवस
फिर हल्ला गुल्ला चारो ओर
एक कदम
फिर एक कदम
बढ़ते हुए कब्र की ओर

अच्छे बुरे हर काम में शामिल
जीवन के जंजाल में शामिल
किसी के शादी
किसी की मय्यत
अफरा तफरी चारो ओर
एक कदम
फिर एक कदम
बढ़ते हुए कब्र की ओर

पाप पुण्य की
नाप जोख में
कभी उत्सव में
कभी शोक में
निराशाओं के सभी रात में
आशाओं की आती भोर
एक कदम
फिर एक कदम
बढ़ते हुए कब्र की ओर .


चलिए अब आपको बतला हीं देता हूँ
पिछले जन्मदिवस पर नानी के नहीं रहने की खबर आने पर घर में रोआ- राहट जैसे शुरू हुआ वैसे हीं जन्म के उत्सव को मै भूल गया .नानी के शारीर को कब्र तक ले जाने में एक हीं बात जेहन में आती रही जो नानी के मय्यत और मेरे जन्म दिन दोनों पर एक साथ सटीक बैठता था

एक कदम
फिर एक कदम
बढ़ते हुए कब्र की ओर


--अरशद अली--

5 comments:

rashmi ravija said...

अरशद जी,
कितना कुछ एक सा घटता है,लोगों के जीवन में....कल ही मेरे बेटे के दोस्त का जन्मदिन था...दोस्तों ने मिलकर उसे सरप्राइज़ पार्टी दी थी...ये लोग एक दूसरे के चेहरे पर केक लगा रहें थे और पिज्जा का आनंद ले रहें थे तभी..उसके मोबाइल बज उठा...और उसकी नानी के गुजर जाने की खबर आई....अक्सर बच्चे नानी के ज्यादा करीब होते हैं....वह भी रोता हुआ घर की तरफ चल पड़ा...माता-पिता तुरंत गाँव के लिए रवाना हो गए...उसकी परीक्षा शुरू होने वाली थी,नहीं जा सका..,आज सारा दिन अपने दोस्तों को सॉरी के मेसेज कर रहा है...अकेला बैठा घर में

शबनम खान said...

Arshad ji...
Padhkar hairani hui ki koi is taraf bhi soch sakta ha...par bohot sahi socha ha...agar aisa ho jaye toh me kya kya karungi yahi soch rahi hu..aur is soch se likhi kavita dil ko chu lene wali ha...aisa likhte rahenge toh pathako ki kami nhi hogi...meri shubhkamnaye aapke sath ha...
dhanyavad..

Krishna Kumar Mishra said...

अति-भावनात्मक लेख

शशांक शुक्ला said...

आप काफी भावुक नज़र आते है

अजय कुमार said...

हिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाई
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