Thursday, March 3, 2011

निरंजन बीमार है......बहुत बीमार ........उसे आपके दुवाओं की ज़रूरत है

निरंजन बीमार है......बहुत बीमार ........उसे आपके दुवाओं की ज़रूरत है



मेरे पड़ोस में चाय की एक छोटी सी दुकान चलने वाले सुदामा भाई का छोटा लड़का निरंजन (5 वर्ष) कैंसर से पीड़ित है....
इलाज के दौरान उसका दाहिना आँख निकलना पड़ा....मगर कैंसर अपना रंग दिखला रहा है.....बात आगे बढ़ गयी है...पुनः
उसे अस्पताल में भर्ती किया गया है.....

जब वो ठीक था तो मेरे ऑफिस के सामने हीं खेलता रहता था......अंदाज़ कुछ ऐसा की मन मोह ले .......मै सुदामा भाई से चाय लाने ले जाने के क्रम में यही कहता था की इसका नाम बम भोला रख दीजिये ......एक दम शांत बच्चा मगर मस्ती में कब ज़मीं में लोटने लगे कोई नहीं जानता.......रंग वही क्रष्ण भगवन वाला....हरकत शंकर भागवान वाली.....बोलने में थोडा कंजूस ......दस बार पूछने पर एक टुक भोजपुरी में जवाब देना और फिर लम्बे समय तक चुप-चाप किसी दुसरे बदमाशी की तेयारी में लग जाना........एक बार अंगूर वाले से अंगूर खरीद कर उसे दिया था .......उसके बाद जब भी अंगूर वाला ऑफिस के आस पास आता निरंजन भाग कर मेरे ऑफिस के सामने आकर खड़ा हो जाता.......शुरू शुरू में तो मुझे समझ में नहीं आया मगर बहुत जल्द समझ गया की निरंजन का आना अंगूर वाले के आने की निशानी है.......ऐसी कई बात मुझे याद आती है जिससे मै अपने बचपन में गोते लगा लेता हूँ......

मगर शायद खुदा को कुछ और मंज़ूर था.......अभी वो कलकत्ता के किसी अस्पताल में अपने बीमारी से लड़ रहा है......उसे पैसे की ज़रूरत है ........सरकार की मदद की प्रक्रिया इतनी सुस्त है की मुझे अपने कुछ साथियों के मदद से उसके इलाज के लिए पैसे बटोरने का काम अपने ऑफिस से टाइम चुरा कर करना ज्यादा अच्छा लगा .....और आप सभी को जान कर सुखद एहसास होगा की लोग बहुत बढ़-चढ़ कर निरंजन के हेल्प में खड़े हो रहे हें.....मगर दुआओं की ज़रूरत अभी भी है.....

आप सभी की दुआ उसे मजबूती देगी मुझे इस पर यकीन है ......और निरंजन वापस उसी अंदाज़ में मेरे ऑफिस के सामने
खेलता नज़र आएगा...आपको क्या लगता है???

Sunday, November 7, 2010

एक वादा टूट गया इस दीपावली में ............अरशद अली

आपका इंतजार कर रहा हूँ ...अभी तक आप नहीं निकले....पापा आपको तो पता है कितनी सारी खरीदारी करनी है..अभी
शाम होते हीं दोस्तों का जमावड़ा लग जायेगा ...सभी पटाखे जलाएंगे और मेरे लिए पटाखे का इंतजाम अभी तक नहीं हुआ ..
माँ को बोल रहा हूँ तो बस यही कहती है ...तुम्हे अपनी पटाखे की पड़ी है ..घर में इतने काम पड़े हें..थोडा इंतजार करो पापा आते हीं होंगे...पापा,आप जल्द से जल्द आओ न...मुझसे इंतजार नहीं होता

एक छोटा बच्चा अपने पापा से ऐसे हीं बात करता है अगर उसके पापा नौकरी के सिलसिले में कई दिनों से बाहर हों और दीपावली की तैयारी में कुछ कमी रह जाए तो...और इसके जवाब में बच्चे के पापा ने क्या कहा होगा आप समझ सकते हें ...

आगे कई संभावनाएं बनते है...
१) पापा वादा के अनुरूप समय से घर आ जाएँ और अपने बच्चे की मनोकामनाओं को पूरा कर दें...मुझे याद है बचपन में मेरे पापा जब भी ऑफिस से आने में लेट हो जाते थे तो मै माँ से पूछना शुरू कर देता था..जहाँ मै इतना बेचैन हो जाता था वहीँ माँ बिलकुल शांत रहती थी ..और थोड़ी देर में पापा आ भी जाते थे..बच्चों का अपने पापा से लगाव होता है..ऐसे भी बच्चों के लिए पापा हमेशा हीरो होते हें..

२) पापा बहुत प्यार से ये बतला दें की आज भी बिजी रहूँगा तुम मम्मी के साथ बाज़ार जाकर पटाखे ले लेना है.मै शाम तक आ जाऊंगा ...मुझे याद है ऐसी हालत का मुझे जब भी सामना करना पड़ा तो,पापा का बहुत प्यार से समझाना,मुझे शांत करने में मदद किया...बाल मन ये जनता है की कहीं न कहीं पापा की कोई मज़बूरी रही होगी नहीं तो पापा आ हीं जाते

और एक तीसरी संभावना ....जिसकी कामना आप कभी नहीं करना चाहेंगे...दीपावली की सुबह,नींद खुली नहीं की रोने की आवाज़ कानों में पड़ी ..आवाज़ हमारे उपर वाले पडोसी के घर से था.दरवाज़े पर भीड़ लगी थी...भीड़ में शामिल हुआ भी नहीं था की पता चला वर्मा जी नहीं रहे...उम्र लगभग 48 साल ..उनकी पोस्टिंग गोला झारखण्ड में थी..परिवार में एक बेटी उम्र 18 साल,एक बेटा उम्र 7 साल...और पत्नी..पिछले 5 दिनों से वो अपनी ड्यूटी पर हीं थे ..दीपावली में घर आना था ...बच्चे इंतजार कर रहे थे...मगर एक फ़ोन पुरे परिवार का होश उड़ा चूका था ...आनन् फानन कुछ लोग गोला जाने की तैयारी कर रहे थे...बच्चों के रोने की आवाज़ कान को चीरते हुए वातावरण गमगीन किये हुए था ....हम सभी ठगा ठगा सा महसूस कर रहे थे..बातों बातों में यही जानकारी मिल रही थी की वर्मा जी का हार्ट अटेक हो गया...मगर इसपर किसी को यकीन नहीं हो रहा था....

वर्मा जी एक हसमुख इन्सान...जब भी मिले हँसते हुए मिले ...होली,दशहरा,ईद ...उनके बिना हमलोगों ने कभी नहीं मनाया..वजह साफ़ थी वो रहते थे तो मस्ती दुगनी हो जाती थी..पढ़े लिखे बेहद समझदार,और शालीन व्यक्ति .

कल शाम ऑफिस से लौट रहा था तो देखा थे बच्चे फुल से सीढ़ी सजा रहे थे ...लाइट लगाने के लिए हेल्प की ज़रूरत हो तो मुझसे कहना कहते हुए मै अपने घर में चला गया ...मुझे पता था वर्मा जी अभी नहीं आयें है..कल सुबह तक आयेंगे.

पिछली दीपावली मुझे याद है..वर्मा जी बच्चों के साथ दस बजे तक लगातार पटाखा जलाते रहे..पुरे बिल्डिंग में कोई ऐसा घर नहीं था ..जो वर्मा जी को बधाई देने नहीं पहुंचा था..बच्चों को ध्यान से पटाखा जलाने का सलाह देते हुए भी लोगों से खुल कर मिल रहे थे..जो भी आता एक रोकेट पकड़ा कर कहते ये आपके लिए ...उनका ध्यान उन दीयों पर भी था जो हवा से बुझ जाते ..बात चीत के क्रम में बुझे दिए को भी जलाते जाते...पूरी तरह से उन्हें जीवन जीना आता हो जैसे...तब मै भी नहीं सोंचा था की ये उनकी अंतिम दीपावली है...

सब कुछ इतना अचानक था कि शब्द में ब्यान करना मुश्किल लगता है..बार बार एक ख़याल आता रहा बच्चों को कैसा महसूस हो रहा होगा..निरंतर उनके रोने की आवाज़ मेरी हिम्मत तोड़ रही थी .और यही लगता रहा की ऐसा नहीं होना चाहिए था....मगर ये भी पता चल रहा था की इश्वर के मर्ज़ी के आगे किसीकी नहीं चलती...बच्चों को चुपकराने वालों को भी रोते हुए देख कर मुझे भी रोना आ रहा था ...

कुछ लोग उनकी बॉडी लाने जा चुके थे...अब सभी को उनका इंतजार था..क्या हुआ-क्या हुआ पूछने वालों की संख्या बढ़ते जा रही थी ..तरह तरह की बाते भी हो रही थी ....इस बिच सब भूल चुके थे की आज दीपावली है..

शाम होते होते बॉडी अम्बुलेंस में आ चूका था....जहाँ पूरी दुनिया दीपावली के दिए जला रही थी वहीँ एक परिवार का बुझा हुआ दिया हम लोगों के सामने पड़ा हुआ था...मिसेज वर्मा जैसे चुप पड गयी थीं,बच्चे पापा,पापा चिल्ला चिल्ला कर रो रहे थे..कहीं न कहीं हम सभी अपनी अपनी आसुओं को छुपा रहे थे ...पूरी बिल्डिंग जहाँ आज जगमगा जाती थी अन्धकार लग रही थी ...भीड़ होते हुए भी एक सन्नाटा पसरा हुआ था...रह रह कर परिजनों को मस्तिस्क चिर देने वाली क्रंदन ..बहुत पीड़ादायक थी..

मै बार बार यही सोंचता रहा....ये बच्चे अब दीपावली को किस रूप में लेंगें... वास्तव में वर्मा जी ने जो बच्चों से वादा किया था तोड़ चुके थे...अब वो कभी बच्चों के साथ दीपावली मानाने नहीं आने वाले...ये एक सच है मगर कितना पीड़ादायक.

Wednesday, October 13, 2010

प्यार तुम्हारा झाड़ू-बेलन--------------अरशद अली

यूं हीं बैठे-बैठे एक कविता का जन्म हुआ. क्यों हुआ कैसे हुआ अगर इसपर लिखने बैठु तो एक हास्य ब्यंग बन जायेगा और एक बेहद गंभीर सब्जेक्ट पर मजाकिया अंदाज़ में लिखना ठीक नहीं होगा.... इसके पीछे के तथ्यों को मुझे लिखना चाहिए की नहीं इसका निर्धारण आप हीं करेंगे .

इस कविता को पढ़ कर आनंद लें.

तुमने कहा,मान गया गर
तो प्यार तुम्हारा ,गुलाब-जामुन
अगर न माना तेरे कहने को
तो प्यार तुम्हारा झाड़ू-बेलन

खट-खट खट-खट
खीट पीट खीट पीट
हँस कर सहा तो सुन्दर यौवन
नज़र घुमाया,तुम्हे भुलाया
फिर प्यार तुम्हारा झाड़ू-बेलन

गिफ्ट जब लाया,गुलाब लगाया
कुछ क्षण गुज़रा हँस कर जीवन
भूल गया जब तेरे जन्म दिवस को
फिर प्यार तुम्हारा झाड़ू-बेलन

खरा उतरा जब हर वादे पर
स्वर्ग सी अनुभूति तेरा छुवन
जब टूट गया कोई वादा मुझसे
फिर प्यार तुम्हारा झाड़ू-बेलन

हँस कर मिला तो हँस कर लौटा
प्रसन्न रहा फिर दिन भर ये मन
जैसे हीं कुछ कमी गिनाया
फिर प्यार तुम्हारा झाड़ू-बेलन

हर जुर्म सहा तेरे प्यार में
हँसता रहा हर समय मै बेमन
अब तो आदत है लेने की
प्यार में तेरे झाड़ू-बेलन .....

Sunday, October 3, 2010

बॉस का ब्लॉग ---------------अरशद अली

नाचीज़ को अरशद कहते हें..

कहियेगा मै पागल हो गया हूँ ..मगर नहीं साहब मुझे अपना परिचय देने दीजिये..

वही अरशद जिसका एक ब्लॉग है..अरशद के मन से....क्यों पहचाने की नहीं?

आप सोंच रहे होंगे बैठे बिठाए परिचय देने की क्या ज़रूरत पड़ गयी ..तो भाई साहब/बहनजी पिछले कई महीनो से मै गायब चल रहा था ...अब गायब क्यों चल रहा था ये जानना हो तो आगे की कुछ पोस्ट पढना होगा..और पोस्ट तो उसी की पढ़ी जाती है जिसका कोई परिचय हो....
रही बात गायब रहने की तो कम शब्दों में बतला देता हूँ ,29 अप्रैल को विवाह बंधन में बंध गया ..और विवाह ब्यस्त हो जाने का एक कारण होता है... पत्नी के आते हीं जिम्मेदारियों का बोझ आ जाता है ..ये बात तो कुछ हद तक ठीक है साथ-साथ विवाह होते हीं इन्सान इतना ब्यस्त हो जाता है की ब्लॉग के लिए टाइम निकल ले मुश्किल है ....मै उन सभी ब्लोगर में माफ़ी चाहूँगा जो ऐसे समय में भी पाठको के करीब रहे...मुझसे तो ये नहीं हो सका ....

मुझे पता है आप मुझे मेरे विवाह की बधाइयाँ ज़रूर देंगे..तो मै आपको ये भी बतलाता चलूँ की मुझे शिक्षा-रत्न सम्मान झारखण्ड बिधान सभा अध्यक्ष द्वारा 15 अगस्त 2010 को प्राप्त हुआ..(शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने हेतु ) मेरी पत्नी के आने के बाद और मेरे विवाह का सबसे बड़ा गिफ्ट रहा....


तीन महीने के बाद ब्लॉग की दुनिया में आया तो रविजा दीदी,राजवंत दीदी के पुराने नए सभी पोस्ट को पढ़ा कुछ एक का टिपण्णी भी कर पाया ..एक बात जो सबसे ज्यादा प्रभावित किया वो रविजा दीदी के रक्षा बंधन के उपलक्ष्य पर आये पोस्ट में मेरे नाम का होना था...कुछ समय के लिए मै मौन हो गया ..और मेरे आखों में दीदी के लिए बहुत सम्मान पानी के रूप में अपनी उपस्थिति बतला गया....मुझे दुःख:है तकनीकी कारणों से उन्हें कोई टिपण्णी नहीं दे सका ...

राजवंत दीदी जो लिखने में माहिर है..और हमेशा मै उनके सोंचने के स्टाइल का कायल हो जाता हूँ...सोंचता हूँ इतना बेहतर और गंभीर चिंतन वो कैसे कर लेतीं हें ..उनके लिखे सभी पोस्ट से बहुत कुछ सिखने को मिलता है.

राजवंत दीदी ने मेरे गायब रहने पर भी मुझे टिपण्णी देना नहीं भूली ...और मै उनका आभारी हूँ...उन्होंने हीं मुझे लिखते रहने का आदेश अपने पिछले टिपण्णी में दिया था और आज मै उनके हीं आदेश का पालन कर रहा हूँ



और अंत में मेरे बॉस के ब्लॉग का पता आपके लिए छोड़े जा रहा हूँ इसी आशा के साथ की आप उनके ब्लॉग पर जाकर उनका ब्लॉग की दुनिया में अविनंदन करेंगे ...उनके लिखने के शैली मेरी तरह आपको भी प्रभावित कर जाएगी.
http://rcppblog.blogspot.com

Monday, June 14, 2010

अपनी भी उमंगें भरती है यू कुलाचे .......................अरशद अली



है आसमान की सीमा
जनता है मन ये मेरा
पर अपनी भी उमंगें
भरती है यू कुलाचे
फिर थक कर दूर जाकर
नहीं ख़त्म होता अम्बर
दिखता है फिर नीचे
सब कुछ छोटा ज़मीं पे
और थक सा जाता पर भी
जाना है अपने घर भी
है आसमान सुन्दर
पर ज़मीं से दूर होकर
फूलने लगती हें सांसे
और लौटता हूँ डर कर
कि मन बड़ा है चंचल
ले जा रहा है उपर
सब छूटते हें नीचे
वो घोंसले दरखतें
है बोध मेरे मन को
मिलेगा सुकून उड़ कर
पर बैठेंगे कहाँ थक कर
क्या खायेंगे चुन कर
और सोंच कर ये सब
आ जाता हूँ नीचे
कि दुनिया बस यहीं है
उड़ना भी दायरे में
जब जन्म है यहीं का
तो मरना भी यहीं पे .

अरशद अली
arshad.ali374@gmail.com (मेरी (हिंदी) ग़लतियों को मेरे मेल पर बतलायेंगे तो मेरी हिंदी भी हिंदी जैसी हो जायेगी-एक आग्रह )

Thursday, June 3, 2010

तुम्हारी कसम मै जहाँ छोड़ जाऊं.................अरशद अली

खुला राज तो तेरी रुसवाई होगी
मै राजे मुहब्बत निहाँ छोड़ जाऊं
जिसे खूने दिल से मै लिखता रहा हूँ
अधूरी हीं वो दास्ताँ छोड़ जाऊं


मेरा ख़ून जो तेरे दर पे गिरेगा
तो फिर हश्र तक भी नहीं उठ सकेगा
मै ये सोंचता हूँ की टकरा के सर को
तेरे दर पे अपनी निशान छोड़ जाऊं


मुझे मेरे मिटने का कुछ ग़म नहीं है
तुम्हारी ख़ुशी में हीं मेरी ख़ुशी है
जरा देख ले तू मुझे मुस्कुरा कर
तुम्हारी कसम मै जहाँ छोड़ जाऊं



अरशद अली
arshad.ali374@gmail.com (मेरी (हिंदी) ग़लतियों को मेरे मेल पर बतलायेंगे तो मेरी हिंदी भी हिंदी जैसी हो जायेगी-एक आग्रह )

Monday, May 10, 2010

कुछ पंक्तियाँ भेट करना चाहूँगा ,शायद आपको थोडा आराम मिले

जीवन दीपक जलते जलते
थक कर एक दिन बुझ जायेगा
अन्धकार जो मिट न पाया
अंत प्रकाश में मिट जायेगा
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छन्भंगुर एहसास
नित नए रंगों में
बनते टूटते नए नए
जाने कितने ख़वाब

राजा बन मन गढ़ंत
न तख़्त न ताज
रंक रंक के शोर में
दबते सब आवाज़

प्रतीक्षा जीवन से लम्बी
पर्वत सा बिश्वास
सब खोया एक एक कर
फिर भी मन को आस .