Tuesday, February 14, 2023

श्रद्धांजलि

जो सुना समझ नही पाया। मेरे दिमाग को झंझोड़ कर रख दिया एक कॉल ने। शून्य बहुत लंबा शून्य! मानसिक द्वंद में डाल कर चुप चाप चले जाना धोखा से कम नहीं लगा। क्यों? क्यों? आखिर क्यों? ये शून्य समाप्त होने का नाम नहीं लेता। कई हजार सवाल से लड़ रहा हूं शायद जीवन भर लडूंगा। क्या हुआ? क्यों हुआ? से निकल नही पा रहा हूं। व्यवहार की लड़ाई हार गया। खो दिया उसे जो शानदार था। मित्र बड़ा भाई बहुत मिलनसार दयालु कर्मयोगी जो पैदल चलता था की सेहत अच्छी रहे ज्यादा से ज्यादा लोगों से मिल कर उनका हाल चाल ले सके निहायत संवेदनशील था शानदार था सरल था सुगम था सहज था वो अब जटिलता के शिखर पर जा बैठा है। अभी भी लगता है सब झूठ है। कोई कह दे की सब झूठ है। अगर ये सत्य है तो ये सत्य बहुत कठिन है। बहुत कठिन। मुझे पश्चाताप है की उन्हें सुन नही पाया अंतिम कुछ माह में जीवन के अपने सबसे बड़े नुकसान को सहन कर पाऊंगा बहुत कठिन है। अत्यंत ऊर्जावान सकारात्मक इंसान का जाना दुखद है बेहद दुखद।

Monday, August 29, 2022

बेरोजगारी

विपक्ष के मंझे हुए एक नेता वर्तमान समस्या,समस्या के कारण और निवारण पर जनसभा में बोल रहे थे। चीख चीख कर व्यवस्था की पोल खोल रहे थे। जिंदाबाद का नारा बीच-बीच में  बुलंद हो रहा था। प्रथम पंक्ति की भीड़ उत्तेजित  थी, पिछला पंक्ति सो रहा था।  इसी बीच मुद्दा बेरोजगारी का आया।  नेताजी ने इसे सभी समस्याओं का जड़ बताया।  कहा,"अपराध" जैसी समस्या समाज में बेरोजगारी से आता है।  तभी एक शख्स चिल्लाया, नेता जी यह सच है कि अपराध बेरोजगारी से आता है मगर श्रीमान यह बतलाइए यह बेरोजगारी कहां से आता है? नेताजी सवाल को अनसुना कर लए में बहे जा रहे थे। अल-बल-सल 'मन की बात' कहे जा रहे थे। प्रश्न पुनः पूछे जाने पर नेता जी झल्ला गए और सेकंड भर में अपनी औकात पर आ गए। कहने लगे,बेरोजगारी का कारण वर्तमान सरकार है।  इस सरकार पर धिक्कार है।  सत्ता पक्ष भ्रष्टाचार के शीर्ष पर अराजकता फैला रही है।  अशिक्षा ,अदूरदर्शिता और इसी भ्रष्टाचार से बेरोजगारी आ रही है। अब नेताजी अपने रंग में आ रहे थे। सभी बेरोजगार नेता जी की जय जयकार लगा रहे थे। एक बेहद गम्भीर मुद्दा बेरोजगारों के जन सभा मे विपक्ष के एक नेता के कारण उबल रहा था। जय जय कार की सोर से सभी बेरोजगारों का मन बहल रहा था। अरशद अली

मेरी जिन्दगी

 एक कलम लो और कागज पर एक सीधी लकीर खींच दो।

नीचे लिख दो मेरी जिंदगी.....

उस सीधी लाइन के


पहले छोर को थोडा गाढ़ा बिन्दु कर दो

और निचे दर्ज कर दो

अपने जन्म की तारिख।

लकीर के अन्तिम छोर को हल्का रहने दो और कुछ लागतार बिंदू  डाल दो .....कुछ इस तरह।

अब बीच के भाग पर नज़र गड़ा कर एक सवाल पुछो खुद से....

क्या इसके अलावा भी जिंदगी का कोई ढंग या रंग तुमने देखा है ?

जिंदगी सरल और सत्य है,एक सीधी लकीर के जैसी  बाकी सब कुछ बनावटी है।

जिंदगी को सरल ही रहने दो और किरदार को आईना।

खामखा,जिंदगी को ताबीज मत पहनाओ।

लंबी उम्र की दुआ अम्मा कर देगी और अब्बू जिंदगी के लकीर को आसान बनाए रखेंगे।

तुम बस दुआ करो।

सीधी जिंदगी लंबी दिखेगी और बहुत आसन भी।

ऐसे भी जिंदगी आसान है खुदा का इस पर एहसान है।

एक कलम लो और कागज़ पर खिंच दो एक सीधी लकीर....

और निचे लिख दो "मेरी जिन्दगी"

अरशद अली

बोकारो इस्पात नगर

Wednesday, December 13, 2017

क्या तुमने कभी देखा है ......अरशद अली ( एक कविता)





क्या तुमने कभी देखा है ......
नए ज़न्मे बच्चे को देखते हुए
माँ-बाप को
उसमे जो दिखता है ...
वो ख़ुशी है

और ख़ुशी,गम को दूर कर देती है












क्या तुमने कभी देखा है
घोड़ों को सपाट धरती पर
दौड़ते हुए
उसमे जो दिखता है ...
वो स्फूर्ति है

और स्फूर्ति,आलस को दूर कर देती है.








क्या तुमने कभी देखा है ...
बरसात में अन्कुराते हुए
नए बीजों को
उसमे जो दिखता है
वो ज़िन्दगी है

और ज़िन्दगी,मौत को करीब कर देती है.


====अरशद अली====

Wednesday, November 29, 2017

सीढियां उपर जाने के लिए होती हें ..........अरशद अली


उनका मर जाना, सहज एक घटना थी।
उम्र के इस पड़ाव पर उन्हें मरना हीं  था।

कुछ लोग उनके  की नहीं रहने पर
होने वाली समस्याओं को अन्यथा में लेंगे।

कुछ साथ देने का आडम्बर रचेंगे। 
कुछ कर्म कांड में ब्यस्त रहेंगे।

सीढ़ी से गिर गयी थी माँ, उसी सीढ़ी से.....
जिसे पिताजी ने उपर जाने के लिए बनवाया था।

सीढियां उपर जाने के लिए होती हें,
और निचे उतरने में भी मदद करती हें।

मगर कुछ सीढियाँ मात्र उपर ले जाती हें।
निचे आने की संभावनाओं को समाप्त करते हुए।

परिवार और सरकार के फाइल में माँ का घटाव हो चूका है,
पता तब चला जब पिताजी का पेंसन आधा हो गया।

मात्र पेंसन आधा नहीं हुआ , पेंसन आधा होते हीं
उनकी सुविधाएँ भी आधी हो गयी।

माँ का जाना सुखद रहा उनके लिए
जो बिछावन पर उनके जीवन को बोझ समझते थें।

परन्तु पिताजी जैसे आनाथ हो गए
4 बजे उठाना, काली  चाय,सब माँ के बदौलत था।

अन्यथा अन्य कहाँ समझ पातें हें उनकी आवश्यकता
अब वो भारी लगते हैं,और एक पहेली भी।

वो कभी माँ को भूल नहीं पाते
जबकि उनकी याददास्त बेहद कमजोर हो चुकी है।

उनका जूता पालीस करने वाला 50 रूपया लौटा गया मुझे
यह कहते हुए चाचा जी पैसा दे चुके थे पुनः दे गए।  

चाचा जी को अपने याददास्त पर गर्व है।
मैंने उनके गर्व को टूटने नहीं दिया, पैसा रख लिया।

आज माँ का नाम लेकर चिल्ला रहे थे।
बहुद दिनों से हवन नहीं करवा रही हो ..कब होगा ??

थोड़ी देर बाद एकदम मौन हो गए,
शायद शोक मना  रहे थे माँ के नहीं रहने का।

पिताजी ने हर दुःख सुख को माँ के साथ जिया है।
जाने कितनी बार माँ में उनके ज़ख्मों को सिया है।

सीढियां उपर जाने के लिए होती हें.......
सीढियां उपर जाने के लिए होती हें.......

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=====अरशद अली======

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Thursday, November 23, 2017

फासलों के लिए एक दीवार होना चाहिए।.......अरशद अली

बेवजह लड़ने का इल्म
भी मेरे यार होना चाहिए ।

सामने से आये कोई
तो वार होना चाहिये ।

टालना मैंने नही सीखा
किसी बात को

सवाल पर जवाब का
प्रहार होना चाहिए ।

बेशक अमन कीमती
 है किसी घर के लिए

फासलों के लिए
एक दीवार होना चाहिए।

जंग जितने का हुनर
एक हीं है "अली"

सर कटाने को
हमेशा तैयार होना चाहिए।

अरशद अली